शनिवार, 21 जनवरी 2012

बस जीने दो यारों...



वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है।


आशुतोष कुमार सिंह

सम्बन्ध। इस बन्धन से आज दुनिया मुक्त होना चाहती है। मुक्ति की कामना रखने वाले इससे अकुता गए हैं। फिजूल का झंझट भला क्यों मोले बिंदासपन में जीने वाले ये लोग। देश आजाद है, हम भी आजाद हैं। आजादी हैं सम्बन्धविहिन समझौतावादी समाज में जीने का। जहाँ पर आप और हम वस्तु की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं। तौले जाते हैं। मापे जाते हैं। रौंदे जाते हैं। पटके जाते हैं। मन भर गया तो उठा कर फेंक दिए जाते हैं। समझौता रद्द कर दी जाती है। कोई बोलने वाला नहीं। टोकने वाला नहीं। मनाने वाला नहीं। हम आजाद देश के आजाद लोग जो ठहरे!

हम चाहते हैं-सम्बन्ध हो बन्धन न हो। बन्धन हमारी समझौतावादी समाज को पनपने देने में सबसे बड़ी रोड़ा जो है। रास्ता सुगम बनाना है तो रोड़ों को तो हटाना ही पड़ता है। हम भी लगे हैं, इन रोड़ों को हटाने में...हो सके तो मिटाने में। न बाँस रहेगा न बाँसुरी बजेगी। और हम मस्त होकर ताँडव करते रहेंगे।

वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है। अब तो उनके लोर (आँसू) भी उनका साथ नहीं देते...वे चाहते हैं अपने लोर से समुद्र में हिलोर लाना। अफसोस! समुद्र की गहराई ने पहले ही उनकी लोर को इतना सोंख लिया है कि आँखों की नमी सूर्ख हो गयी हैं। अब तो बंद होने को आई पुतलियाँ तमाशबिन बन कर रह गई हैं।

सम्बन्धविहिन समाज के निर्माण का वायरस धीरे-धीरे मानवीय धरा को अपने जद में लेने में सफल हो रहा है। और हम उसकी सफलता पर ताली बजा रहे हैं। जश्न मना रहे हैं। आजादी के गीत गा रहे हैं।
दुनिया में कुछ दूसरे लोग भी हैं। जिन्हें इनकी आजादी पसन्द नहीं है। वे इनसे जलते हैं, खुद को जलाते हैं और इसी में भस्म हो जाते हैं। इनको वे वायरस कहते हैं।

अब उन्हें यह अनुभव हो गया है कि उन्हें जरूरत है मजबूत एंटीवारयस की। जिसमें सम्बन्धों को जीने की ललक हो। सम्बन्धों की समझ हो। एक-दूसरे से बंधे रहने की चाहत हो। बंधन का अनुशासन हो। उनके लिए सम्बन्धों की परिभाषा ही दूसरी है। वे सम्बन्धों से मुक्त नहीं बल्कि सम्बन्धों से युक्त रहना चाहते हैं।

सच में एक-दूसरे से समान रूप से बंधने को ही तो सम्बन्ध कहते हैं। बंधन में असमानता ही सम्बन्धों को असहज बनाती है। असुरक्षित करती है और सम्बन्धविहिन वायरस को फैलने का प्लैटफॉर्म देती है। सम्बन्ध कभी भी विषम नहीं होता। वह सम् ही होता है। सम् का मतलब समानता से भी है और समर्पण से भी। दोनों के बीच संबन्धों का तापमान जबतक बराबर रहता है, समर्पण के भाव में गहराई रहती है...सम्बन्ध बने रहते हैं। जब तापमान में उतार-चढ़ाव आता है और कुछ ज्यादा ही आ जाता है, तब सम्बन्ध समान नहीं रह जाते। सम्बन्ध में से सम् अर्थात् समानता और समर्पण गायब हो जाते हैं। इस सम् के बिना सम्बन्ध की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? इसके बिना सम्बन्ध तो ‘बन्ध’ बनकर ही रह जाता है। और इसी ‘बन्ध’ में केमिकल लोचा होकर संबन्धविहिन समाज का वायरस तैयार होता है।

हम तो दर्शी हैं। वायरस को फैलते भी देखते हैं और एंटीवायरस को इससे जुझते भी। जीत किसकी होगी यह तो कोई दूरदर्शी ही बतायेगा। मैं तो बस सम्बन्धों को जीने में विश्वास करता हूँ, जीता भी हूँ और अपने वायरसों एवं एंटीवारसों से यही चाहता हूँ-बस जीने दो यारों...

संपर्क-91-8108110151

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

‘इंसाफ’ में पवन-क्रिशा और मनोज तिवारी


भोजपुरी फिल्म




भोजपुरी फिल्मों में अपनी पहचान के लिए जूझ रहे मनोज तिवारी के लिए यह फिल्म संकटमोचक का काम कर सकती है।

भोजपुरी फिल्मों के सुपरस्टार पवन सिंह व नई सनसनी अभिनेत्री क्रिशा खंडेलवाल की जोड़ी आने वाली फिल्म ‘इंसाफ’ में धमाल मचाने को तैयार हैं। ‘इंसाफ’ में पवन सिंह व क्रिशा खंडेलवाल पति-पत्नी की भूमिका में हैं। फिल्म का निर्देशन अजय श्रीवास्तव ने किया है। फिल्म को लेकर पवन-क्रिशा काफी उत्साहित हें। यशी फिल्म्स् प्रा. लि. प्रस्तुत इस फिल्म में मनोज तिवारी, संगीता तिवारी, उर्वशी चौधरी, प्रिया पांडेय, रवि उज्जैन, सिद्धार्थ रॉय व गजेन्द्र चैहान की प्रमुख भूमिकाएँ हैं। फिल्म के गीतकार अशोक कु. दीप व विनय बिहारी, संगीतकार अशोक कुमार दीप हैं। फिल्म दुर्गा पूजा पर प्रदर्शित होगी।
स्रोतः प्रशांत-निशांत






सिनेमा

रिक्शा वाला बना ऑटो ड्राईवर


भोजपुरी के फिल्मों में अपनी अलग पहचान बना चुके दिनेश लाल यादव जमीन से जुड़े मुद्दे पर बनने वाली फिल्मों में काम करना ज्यादा पसंद करते हैं। यहीं कारण है कि वे निरहुआ रिक्शा वाला में रिक्शे वालों की जिंदगी को पर्दे पर जीने के बाद ऑटो रिक्शा वालों की जिंदगी को पर्दे पर जीने जा रहे हैं।

भोजपुरी फिल्मों के स्टार दिनेशलाल यादव अब ऑटो ड्राईवर की भूमिका में नजर आएगें। जुबलीस्टार निरहुआ ‘निरहुआ मेल’ में ऑटो ड्राईवर की जबरदस्त भूमिका में हैं। ‘निरहुआ रिक्शा वाला’ में रिक्शा वाले की शानदार भूमिका निभा चुके निरहुआ ‘निरहुआ मेल’ में ऑटो चालक की दर्द व समस्याओं को भी बड़े पर्दे पर प्रस्तुत करेंगे। श्री प्रियंका पिक्चर्स के बैनर तले बन रही इस फिल्म में निरहुआ का कंपलीट एक्शन देखने को मिलेगा। इस बावत निरहुआ का कहना है कि ‘‘निरहुआ मेल’’ इस फिल्म में जिस तरह का एक्शन सीन है वैसा एक्शन शायद ही किसी दूसरी भोजपुरी फिल्म में दर्शकों को देखने को मिला हो। फिल्म के एक्शन दृश्यों को फिल्माने में तेलुगु व तमिल फिल्मों के मशहूर एक्शन मास्टर वेकेंट ने जबरदस्त तरीके से मेहनत की है। इस फिल्म की मुख्य अदाकारा पाखी हेगड़ें होंगी। फिल्म में हास्य कलाकार मनोज टाईगर, रोजा उस्मानी, गोपाल राय, पुष्पा वर्मा व अवधेश मिश्रा की प्रमुख भूमिकाएं हैं। निर्माता के. एस.साई बाबा व ए.दास के इस फिल्म का निर्देशक सुब्बाराव गोसांगी हैं जो आखिरी रास्ता, शिवा जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं। फिल्म के गीतकार विनय बिहारी, प्यारेलाल यादव, संगीतकार राजेश-रजनीश हैं।

स्रोतः प्रशांत-निशांत

शनिवार, 13 अगस्त 2011

21वीं सदी का गांधी


आशुतोष कुमार सिंह

मोहनदास करमचंद गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और अहिंसक मार्ग से भारत को आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह मार्ग इतना कारगर होगा। लेकिन धीरे-धीरे गांधी आगे बढ़ते गए और उनका कारवां बढ़ता गया। लोग जुड़ते गए। आखिरकार फिरंगी देश को छोड़ कर जाने के लिए मजबूर हुए। भारत आजाद हुआ। दुर्भाग्य देश का, गांधी के विचारों का और खुद गांधी का कि भारतीय आजाद नहीं हो पाए!
भारतीय भूखंड को दो देशों में विभक्त कर दिया गया। भारत की कोख से पाकिस्तान रूपी एक नए देश को जबरदस्ती कहें या मजबूरन जन्म हुआ।
खैर यहां पर मेरी मंशा भारत-पाक के संबंध में चर्चा करने की नहीं है। मैं आजादी के बाद के भारत की बात कर रहा हूं। गुलाम भारतीयों की बात करना चाहता हूं। आजादी के बाद जिन लोगों के हाथ में जनता ने अपनी सेवा कराने का कार्यभार सौंपा, वे लोग अपने बाद वाली पीढ़ी को यह बताने में नाकाम रहें कि उन्हें जनता ने अपनी सेवा करने के लिए अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद अथवा विधानसभाओं में भेजा है। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की यह संवादहीनता धीरे-धीरे इतनी प्रबल हो गई कि आज जिन पर जनता की सेवा करने का कार्यभार है, वे ‘जनसेवक’ की जगह ‘खुद के सेवक’ हो गए हैं।
परिणाम स्वरूप जनतंत्र का ‘तंत्र’ जन को अपनी पैरों की धूल समझने लगा। सबसे चिंतनीय स्थिति तो उस समय से उत्पन्न होने लगी, जब इस ‘तंत्र’ के ‘कलपुर्जे’ अपनी सेवा के बदले में ‘कुछ’ की मांग करने लगे। जन को लगा कि अगर कुछ देने भर से उनका काम हो जाता है तो इसमें बुराई क्या है? शुरू में जन की ओर से की गई यह गलती धीरे-धीरे इतनी विकराल हो गई कि ये कलपुर्जे बिना ‘कुछ’ लिए काम करना ही बंद कर दिए।
ऐसे में जन में ‘तंत्र’ के इन ‘कलपुर्जों’ के प्रति दुराव की भावना का पनपना स्वाभाविक ही (था) है। पहले तो जन को लगा कि कोई बात नहीं धीरे-धीरे सबकुछ ठीक हो जायेगा। लेकिन जब सबकुछ में कुछ भी ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिखी तो 21 वीं सदी के गांधी का जन्म हुआ। जिसको लोग 21 वीं सदी के दूसरे दशक में अन्ना हजारे के नाम से जान-पहचान रहे हैं। वैसे तो इस नाम से देश-दुनिया के लोग परिचित थे लेकिन जब इस नाम ने गांधी का रूप धारण किया तो सारी दुनिया देखती रह गई। गुलाम भारतीयों को लगा कि अब उनको भी आजादी मिलने वाली है। पूरे देश में अन्ना रूपी गांधी की आंधी उसी तरह बहने लगी जैसे 20 वीं सदी के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक में महात्मा रूपी गांधी की बही थी। जिन्होंने फिरंगियों को सात-समंदर पार जा ढ़केला।
इसी तरह की आंधी की बयार दिल्ली के जंतर-मंतर के प्रांगण से बही और देखते ही देखते पूरा हिंदुस्तान इसके आगोश में आ गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ चली इस बयार ने ‘तंत्र’ को यह बता दिया कि तुम ‘जन’ के सेवक हो, जन के मालिक नहीं। 21वीं सदी का चालाक हो चुके ‘तंत्र’ ने भी चालाकी से इस बयार को तुरंत शांत करने के लिए, अन्ना की शर्तों को मान लिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बही इस आंधी में जनतंत्र को मजबूत करने वाला चौथा स्तंभ अर्थात् मीडिया ने सराहनीय कार्य किया। लेकिन यह एक अहम सवाल है कि मीडिया ने क्या सचमुच प्रशंसनीय कार्य किया अथवा उससे हो गया!
यह जगजाहिर है कि पिछले दो दशकों में मीडिया ने अपना एक अलग तंत्र विकसित किया है, जो जनतंत्र के ‘तंत्र’ के साथ सांठ-गांठ कर के जन में भ्रम पैदा करने का काम करता रहा है। खैर जाने-अंजाने में ही सही, मीडिया ने गांधी को उभारने का काम तो किया ही। इसके लिए उसकी सराहना तो की ही जानी चाहिए।


पिछले दो सालों से महात्मा गांधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ के सौ साल पूरे होने के परिप्रेक्ष्य मंर पूरे हिंदुस्तान में कई जगहों पर गांधी की प्रासंगिकता पर नए सिरे से बहस चलती रही है। इन्हीं बहसों के परिणाम के रूप में 21 वीं सदी के गांधी के जन्म को भी लिया जाना चाहिए। जिसने गांधी की प्रासंगिकता को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है और ‘तंत्र’ के ‘कलपुर्जों’ को यह बताने में सफल रहा है कि सुधर जाओ नहीं तो ‘ईंधन’ बंद कर देंगे।
बचपन से स्व. पं. श्री राम आचार्य की यह उक्ति सुनता रहा हूं-21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य। तो क्या सचमुच इस सदी में हम 20 वीं सदी के स्याह पक्षों को उज्ज्वल कर पाएंगे! अगर यह संभव हो गया तो शायद जगदगुरु भारत को एक बार फिर से सोने की चिड़िया कहलाने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
लेखक संस्कार पत्रिका में सीनियर कॉपी एडिटर हैं
संपर्क
zashusingh@gmail.com

सोमवार, 8 अगस्त 2011

आत्महत्याओं का शहर लखनऊ

पूरे धरती को अपने माथे पर उठाने वाले शेषनाग के अवतार लक्ष्मण की इस नगरी में उनके नागरिक अपना बोझ नहीं उठा पा रहे है! 15 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक, सब के सब मौत को अपना यार बना रहे हैं। लखनऊ वालों का यह याराना आने वाले समय में सूबे की सरकार को जनता की अदालत में बेनकाब कर सकता है।


आशुतोष कुमार सिंह

उत्तरप्रदेश की राजनीतिक राजधानी होने के नाते राजनीतिक कारणों से से लखनऊ चर्चा में बना ही रहता है। पिछले एक महीने से सूबे में बढ़ते अपराध ने राजकीय और राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान अपने तरफ खींचा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से, मुस्कुराने वाला लखनऊ टेंशन में जी रहा है। इसकी तरफ शायद ही किसी राजकीय अथवा राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान गया है। इसकी एक बानगी पिछले शनिवार (9, जुलाई,2011) को देखने को मिली जब बीए प्रथम वर्ष का छात्र अनुभव गुप्ता ने शहर के रतन स्कावयर बिल्डिंग से छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने जीवन को यमराज को सौंपने के पूर्व उसने ग्यारह पन्ने का सुसाइड नोट लिखा। अपने मौत के नाम इतना लंबा खत, अनुभव गुप्ता की जिंदगी का अनुभव कितना बुरा रहा होगा इसको बयां करने के लिये पर्याप्त है।
लखनऊ वाले अवसाद में जी रहे हैं, यह बात कहने की हिमाकत मैं इसीलिए कर पा रहा हूं क्योंकि इस बावत मैंने प्रयोग के तौर पर एक छोटा सा रिसर्च किया है। जिसमें मैंने पिछले महीने की 15 तारीख से लेकर 30 तारीख तक के दैनिक अखबारों में से किसी भी पांच दिन का अखबार निकाल कर उसमें छपे आत्महत्याओं से जुड़ी खबरों का अध्ययन किया इस अधययन में चौकाने वाले परिणाम सामने आए। इन पांच दिनों के अखबार में केवल लखनऊ शहर से 13 आत्महत्याओं की खबर प्रकाशित की गई थी। जिसमें तीन आत्महत्याएं पत्नी के मायके जाने के कारण, एक पति से विवाद के कारण, दो पत्नी से विवाद के कारण, एक दहेज प्रताड़ना के कारण और ६ अज्ञात कारणों से की गई थी।
15 जून को चार लोगों की आत्महत्या की खबर प्रकाशित हुई। फतेहगंज मंडी का रहने वाला 50 वर्षीय मुन्ना लाल वाल्मिकी ने पत्नी के मायके चले जाने के कारण मौत को गले लगा लिया। ठीक इसी तरह 22 साल का यहियागंज निवासी शैलेंद्र कुमार ने भी पत्नी अंजली के मायके चले जाने के कारण यमराज को न्योता दे दिया। अभी इनकी शादी के महज सात महीने ही गुजरे थे। इसी दिन मड़ियाव सरैया टोला निवासी 45 वर्षीय रवींद्र चौहान जो कि राज मिस्त्री था, ने भी खुदकुशी कर खुद को खुद से मुक्त कर लिया। इसी तरह दहेज प्रताड़ना से परेशान होकर शादी के तीन महीने में ही रजनी (22) ने अपनी देहलीला समाप्त कर लिया। 19 जून को शहर से खुदकुशी का एक मामला प्रकाशित हुआ। मड़ियाव के आईईसी कैंपस में रहने वाले राजीव कुमार का पुत्र पुरवा वर्मा जो कि अभी महज 15 साल का था और नवीं कक्षा में पढ़ता था, ने आत्महत्या कर लिया। 20 जून को नवीपना गांव के रहने वाले ननकू लाल का पुत्र नीरज(25) ने पत्नी से विवाद के कारण आत्महत्या कर ली तो दूसरी तरफ राजाजीपुरम सेक्टर-12 निवासी गजराज (32) जो कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था, अपने जीवन का कंपटीशन पास नहीं कर सका। 21 जून को बंथरा नारायणपुर की ललिता अपने पति नीरज के मारपीट से तंग आकर खुद को यमराज के हवाले कर दिया। इसी दिन अलीगंज के मूक व बधिर संकूल परिसर में 50 साल का एक गार्ड शिवपाल ने मौत को गले लगा लिया।
29 जून को चार खुदकुशी के मामले प्रकाशित हुए। कृष्णानगर निवासी कैलाश, बिजली विभाग से रिटायर हो चुके 70 वर्षीय नरेंद्र प्रसाद, मोहन लाल कि नातिन विशेष गुप्ता (18) और गोमती नगर विवेक खंड निवासी संतोष कुमार (35) ने भी मौत से दोस्ती करने में ही अपनी भलाई समझी।
ऊपर जितनी घटनाओं का मैंने जिक्र किया यह तो महज बानगी मात्र है। वास्तविक स्थिति तो और भयावह होगी।
ऊपर की तस्वीर देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस कदर लखनऊ अवसाद के गिरफ्त में आता जा रहा है। किस कदर मौत से दोस्ती गांठ रहा है।
जिस तरह से आदमी का अपने जीवन के संघर्षों से मोह भंग हो रहा है, वह सामाजिक परिवेश में हो रहे नकारात्मक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। धैर्य कमजोर हुआ है। साहस गूम होता जा रहा है। प्यार, स्वार्थ होता जा रहा है। वैसे भी यह सर्वविदित है कि जहां स्वार्थ परम हो जाता है वहां पर रिश्तों की कोई अहमियत नहीं रह जाती। कल तक संयुक्त परिवार के टूटने पर हम मातम मना रहे थे और आज एकल परिवार भी टूटने लगे हैं। क्यों ? इस क्यों के जवाब में बदलते सामाजिक परिवेश की कहानी छुपी हुई है।
दूसरों को मुस्कुराने की नसीहत देने वाला लखनऊ आज अवसाद में है। इस अवसाद को देखने समझने वाला कोई नहीं है। पूरे धरती को अपने माथे पर उठाने वाले शेषनाग के अवतार लक्ष्मण की इस नगरी में उनके नागरिक अपना बोझ नहीं उठा पा रहे है! 15 साल के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक, सब के सब मौत को अपना यार बना रहे हैं। लखनऊ वालों का यह याराना आने वाले समय में सूबे की सरकार को जनता की अदालत में बेनकाब कर दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
सूबे की कलयुगी सरकार को चाहिए कि वह लक्ष्मण नगरी में ऐसी रेखा खींचे जिससे खुदकुशी करने वालों की आत्मा को हरने के लिए यमराज का प्रवेश न हो सके। अगर इसी तरह यमराज को असमय लखनऊ वालों का प्राण हरने का मौका मिलता रहा तो, इन अतृप्त आत्माओं की काली छाया से सूबे की ‘मायावी नगरी’ को कौन बचा सकता है!

नोट
यह लेख जून 2011 में लिखा गया था
लेखक संस्कार पत्रिका से जुड़े हुए हैं


मुंबई सबकी है...

मुंबई में आए हुए तीन हफ्ते हो गए हैं लेकिन कैसे 21 दिनों का यह समय यूं गुजर गया मालुम ही नहीं चला। शायद मुंबई की यही गति है, जहां पर समय बहुत तेजी से निकलता चला जाता है। इस गति से जो तारतम्य बैठा लेता है, उसके लिए तो अख्खा मुंबई अपनी लगने लगती है लेकिन जो पिछड़ जाता है, वह खुद को और मुंबई को आजीवन कोसते रहता है। इतने दिनों में मुंबई का जो रुप तो मैंने देखा है, उसके आधार पर तो यह तो कह ही सकता हूं कि मुंबई सबकी है। बस शर्त एक है कि आप इसकी गति के साथ खुद का सामंजस्य बिठा लें।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

निरहुआ को मारने की धमकी

आशुतोष कुमार सिंह



उत्तर-भारतीयों के लिए मुंबई में हमेशा से समस्याएं खड़ी होती रही है। इस एक फिल्म निर्माता ने भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार दिनेश लाल निरहुआ को जान से मारने की धमकी दी है। इस बावत दिनेश ने दक्षिण भारत के यमन में एफआईआर दर्ज करा चुके हैं। वहां के थाना प्रभारी मैरी क्रिश्चयन पॉल ने खबर की पुष्टि करते हुए कहा कि,‘हमने एफआइआर दर्ज करके जांच शुरू कर दी है। पॉल ने कहा कि वे निरहुआ की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था कर दिए हैं। साथ ही जिस न. से निरहुआ को धमकी मिली थी उसकी डिटेल निकाली जा रही है।’

क्या कहते हैं निरहुआ

भोजपुरी फिल्मों के सबसे महंगे अभिनेता दिनेश का कहना है कि , मैं इन दिनों दक्षिण भारत के यमन में अपनी नई फिल्म ‘निरहुआ मेल’ की शूटिंग कर रहा हूं। कुछ दिन पहले मो0 नं0-9967878630 से सतीश भाविस्कर नामक एक व्यक्ति ने मुझे फोन किया और खुद को फिल्म निर्माता बताया। फिर उसने मुझसे अपनी फिल्म के लिए डेट्स देने की बात की। मैने उससे कहा कि सर मेरे पास अगले दो साल बाद का डेट्स आपको दे सकता हूं। इस पर आपत्ति दर्ज करते हुए उसने मुझसे 1 करोड़ रुपये देने को कहा। मैंने कहा क्यों, तो उसने कहा नहीं दोगे तो मुंबई में फिल्म प्रदर्शित नहीं होने दूंगा। पहले तो मैंने सोचा कि कोई सरफिरा होगा, सो भूल गया। लेकिन उसने मेरे निर्माता अभय सिन्हा, आलोक कुमार व दुर्गा प्रसाद को भी धमकी दे डाली की निरहुआ को लेकर फिल्म बनावोगे तो मुम्बई में फिल्म रिलीज नहीं होने दूंगा। यही नहीं उसने स्टूडियो मालिक दुर्गा प्रसाद को मेरे फिल्मों के गाने रिकार्डिंग करने से भी रोका, ऐसा नहीं करने पर स्डूडियो में तोड़-फोड़ करने की धमकी दी। उसने मेरे म्यूजिक डायरेक्टर राजेश-रजनीश को भी धमकी दी। जब मुझे इसकी सूचना इन लोगों ने दी तो मुझे लगा की ये कोई सरफिरा नहीं है, बल्कि वे सचमुच नुकसान पहुंचाना चाहता है। जब मुझे लगा कि यह मामला बढ़ रहा है तो मैंने यमन पुलिस थाना में उसके ऊपर मामला दर्ज करवाया है। गौरतलब है कि इसके पहले भी अभिनेता मनोज तिवारी के घर पर भी कुछ अराजक तत्वों ने पत्थरबाजी की थी। बाद में मामला सलट गया था।

कौन हैं धमकी देने वाला

धमकी देने वाले के बारे में यह भी खबर है उसका मनसे संपर्क है और वह मनसे के चित्रपट कर्मचारी सेना का उपाध्यक्ष है। इस बावत सतीश भाविस्कर का वकिल अखिलेश चौबे का कहना है कि ‘सतिश पिछले 6 महीने से निरहुआ को फॉलो कर रहे थे ताकि वे उनकी फिल्म की स्टोरी सुन लें। उस दिन भी वे निरहुआ से यहीं कहे थे कि अगर उसके पास समय नहीं है तो वे हैदराबाद ही आ जाते हैं। लेकिन निरहुआ जानबूझ कर उनको टाल रहे हैं। जहां तक निरहुआ के कंपलेन का सवाल है तो वह बिल्कुल झूठा है। और यह मीडिया में आने का एक तरीका है।
सच कौन बोल रहा है, यह तो आने वाले समय में मालूम चल ही जायेगा। लेकिन अगर निरहुआ सच कह रहे हैं तो यह मामला गंभिर है और अगर झूठ बोल रहे तब तो यह मामला और भी गंभिर है। क्योंकि तब उन पर मीडिया सहित अपने दशर्कों को भी गुमराह करने का आरोप लगेगा।