राम जी के चिरई, राम जी के खेत खा ल चिरई भर-भर पेट. ई लाइन हमनी के लइकाइएं से सुनत आ रहल बानी जा. एह लाइन प धेयान से सोचला प ई महसूस होखेला कि ई एगो पंक्ति में हमनी के संस्कार आ संस्कृति के सार छुपल बा. एह पंक्ति से ई बहुते आसानी से अंदाजा लगावल जा सकेला कि हमनी के भोजपुरिया समाज सांस्कृतिक आ सामाजिक रूप से केतना बरियार रहल बा. एह से ईहो साफ हो रहल बा कि भोजपुरिया लोग शुरुए से प्रकृति के नीयरा रहल बा. प्रकृति के हर चीज से इनकर लगाव रहल बा.
बाकिर समय के संगे-संगे बदलाव के अइसन दौर चलल कि भोजपुरिया लोग आपन मूल संस्कार से भटके लागल. शांति के केन्द्र मानल जाए वाला बिहार में अशांति के गिरफ्त में आ गइल. अउर हाल ई हो गइल कि आज ना त राम जी के चिरई लउकत बाड़ी स अउर ना राम जी के ऊ खेते
लउकत बा.
राम जी के चिरई राम जी के लगे धीरे-धीरे जा रहल बाड़ी अउर जवन खेत बा ओकरा खातिर हमनी के अपने में खुन के होली खेल रहल बानी जा. चारो-ओर हाहाकार मचल बा. अइसन नइखे की हमनी के नइखी स जानत की ई सब काहे हो रहल बा? बलुक जानबूझ के हमनी के समस्या के उत्पन्न क रहल बानी जा.
आज हमनी के जल-जंगल आ जमीन से आपन नाता खतम करत जा रहल बानी जा. प्रकृति से दूर रह के विकास के परिकल्पना कइल जा सकेला? हम भोजपुरियन में प्रकृति के नीयरा रहे के आदत रहल बा. हमनी के पुरनिया गाछ लगावे के हमनी के शिक्षा देत रहन आ ओह लोगन के बात प हमनी के अमलो करत रहनी जा. बाकिर अब हमनी के धीरे-धीरे पुरनिया लोगन के लगे बइठे से कतराए लागल बानी जा. बुजुर्ग अब हमनी खातिर बोझ हो गइल बाड़न. उनकर बात के हमनी के कुड़ा के टोकड़ी में डाल देले बानी जा. उनका के उनका हाल प अकेले छोड़ देले बानी जा. हमनी के एह बेरूखी से हमनी के भीतर धीरे -धीरे भोजपुरिया संस्कार के लोप हो रहल बा. हमनी के ई भूला गइल बानी जा कि जेतना ज्ञान बुजुर्गन के लगे बा ओतना ज्ञान हमनी के कवनो लाइब्रेरी में ना मिली. अनुभव के जवन पूंजी होखेला ओकर मोकाबला केहू नइखे क सकत. एह से नया पीढ़ी के चाहीं कि आपन बुजुर्ग लोगन के नीयरा बइठस आ उनका से जिनगी जिए के गुरू मंत्र लेस. अउर अइसन खेत के तइयार करस जहवां राम जी के चिरई भर-भर पेट खा सको.
हमनी से नीमन ऊ भाई लोग बा जे एह देश के छोड़ के दोसर देश में बस गइल बाड़न. एकरा बादो ऊ आपन माटी के नइखन भुलाइल. आपन पुरखा-पुरनिया के आजो इयाद क रहल बाड़न. जवना के एगो नीमन उदाहरण त्रिनिदाद आ टोबैको में देखे के मिलल. जहवां भारतीय मूल के खासतौर से बिहार के लोग भोजपुरी के पहिला कवि संत कबीर दास के 613वां जनम दिन बहुते धूम-धाम से मनवल. दोसर ओर हमनी के बानी जा हमनी के आपन पुरखा-पुरनिया के भुलात जा रहल बानी जा.
खैर एह सब बातन के अलावा भोजपुरी खातिर एगो नीमन खबर बात ई बा कि कान फिलिम फेस्टीवल में भोजपुरी फिलिम आपन झंडा गाड़े में सफल रहल बिया. अइसन पहिला हाली भइल बा जब कान फिलिम समारोह में भोजपुरी फिलिम के एंट्री मिलल होखे. एकरा बाद ई मानल जा रहल बा कि एह से भोजपुरी फिलिमन के विश्व सिनेमा में आपन उपस्थिति दर्ज करावे में मदद मिली. भोजपुरी फिलिम के कान तक ले जाए में अभिनेता रवि किशन के अहम योगदान रहल बा. रवि किशन के भोजपुरी फिलिम 'जला देब दुनिया तोहार प्यार में' एह बरिस के कान फिलिम समारोह के ऑफिशियल एंट्री में शामिल भइल बिया. रोचक तथ्य ई बा एह फिलिम के एगो अमेरिकी कंपनी पुन के सहयोग मिलल बा, जवना के वजह से एह भोजपुरी फिलिम के कान समारोह स्थित भारतीय मंडप में स्थान मिलल. भोजपुरी फिलिम जगत खातिर ई एगो बड़ उपलब्धी बा. एह सफलता के बाद भोजपुरी सिनेमा के एगो नया दिशा त मिलबे करी.
अब समय आ गइल बा जब हमनी के ई संकल्प ली जा कि हमनी के राम जी के खेत के राम जी के चिरई के भर भर पेट खाए लायक उपजाऊ बनाइब जा. आज अतने.. अगिला हफ्ता फेर मिलब.
राउर
आशुतोष कुमार सिंह
संपर्क
bhojpuriamashal@gmail.com
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