शनिवार, 3 जुलाई 2010

नये कलेवर में समलैंगिकता के एक साल

आशुतोष कुमार सिंह

दो जुलाई, 2010 को कई अखबारों ने बड़ी बोल्ड तस्वीरें प्रकाशित की. कुछ हंसते-खिलखिलाते चेहरे, एक दूसरे को आलिंगन में भरते और चूमते चेहरे. 03 जुलाई को सुबह-सुबह उक्त तस्वीरों ने मुझे एक साल पहले का वह मंजर याद दिला गया जब कुछ लड़के और लड़कियों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर परेड किया था और इसे समलैगिकों का परेड कहा गया. जो कानूनी अधिकार की लड़ाई की मांग करते हुए परेड कर रहे थे. हालांकि आज से ठीक एक साल पहले अर्थात 02 जुलाई 2010 को दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैगिकता को कानूनी अधिकार दे दिया. इसके बाद फिर एक दौर बहस बा तलब शुरू हुई. दक्षिण पंथियों ने इसे सीधे-सीधे भारतीय सभ्यता व संस्कृति के खिलाफ बताया तो वहीं कुछ खुले विचार वाले लोगों ने इसे स्वच्छंदता की जीत बताया.
सृष्टि के सृजन के समय से ही काम आकर्षण व बहस का विषय रहा है. हमारे पौराणिक ग्रंथ भी इन मुद्दों पर खुली बहस की गुंजाइश रखते हुए समलैंगिकता की पुष्टि करते हैं. आज इसके स्वरूप थोड़े नये कलेवर में नजर आ रहे हैं. यह साफ तौर पर स्थापित है कि आंनद की प्राप्ति मानवीय स्वभाव है. चाहे आनंद की प्राप्ति साधना से हो, समाधि से हो या फिर काम से. काम के माध्यम व उसकी प्रकृति पर बहसें होती रही है. सही या गलत पर लॉबियां बनती रही है. सबके लिए आनंद का दायरा अलग-अलग है. गे और लेस्बियनों की भी अपनी दुनिया है. पर यह कभी नहीं भूलना चाहिए की कई जीतने वाले जीत कर भी हार जाते हैं और हारने वाले हार कर भी जीत. कानून भले ही कवच का काम करे लेकिन अंतर्मन की रक्षा नहीं कर सकता. उदाहरण के रबप में जैसे की बाबा भारती जीते थे. यह कहानी आप सब ने जरूर पढी होगी कि किस तरह बाबा भारती ने डाकू खड़ग सिंह को मात दी थी.
इस समय हम गे और लेसबियन के नाम पर किसको धोखा देने का प्रयास कर रहे है!! शायद प्रकृति को. क्या कभी भी कोई प्रकृति को धोखा दे पाया है? शायद नहीं, दे भी नहीं सकता. धरती पर मानव समाज के उत्थान और पतन का गवाह पुरूष-महिला संबंध ही रहे हैं. अब क्या ये संबंध टूटने लगें है? क्या मानव की कोई नई कहानी लिखने की तैयारी हो रही है? ये सारे सवाल हैं जिनका जवाब हमें तलाशने होंगे.

एक और सवाल है कि आखिर महिला, महिला के प्रति और पुरुष, पुरुष के प्रति आकर्षित क्यों होने लगे हैं? केवल दैहिक सुख कारण है अथवा कुछ और भी कारण हैं. सामाजिक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं. समाज में पुरूषों का महिलाओं पर किए गए अत्याचार के परिणाम स्वरूप लेस्बीयन संबंधों के रुप में सामने आए हों ऐसा भी हो सकता है. उसी तरह महिलाओं के बदले हुए रूप ने शायद पुरूषों को भी गे संबंधों की तरफ ढकेला हो. महिलाएं अपने महिलापन का दुरुपयोग करने लगी हैं. शायद यह उनका प्रतिशोध हो. पर इसमें वे यह भूल जाती हैं कि इसके चक्कर में वे अपना मूल स्वभाव ही भूलती जा रही हैं.
आज करियर का दबाव पुरूष और महिला दोनों पर है. करियर बनाना है तो लंबे समय तक बाहर रहना ही पड़ेगा. कई लोगों का तो यहां तक कहना हैं कि करियर के चक्कर में लड़कियां जिस हॉस्टल में रहती हैं वहां पर वे अपने सबसे नजदीकी सहेली का सहयोग अपने सेक्स पीपासा को शांत करने के लिए लेने लगती हैं. यह दैहिक सुख उनको पुरूष शरीर की मांग को बहुत हद तक कम कर देता होगा. ऐसी स्थिति उन लड़कियों के साथ ज्यादा है जिनका कोई पुरूष मित्र नहीं है, अगर है भी तो दोस्ती उस स्तर की नहीं है जहां पर संभोग की स्थिति पैदा हो सके. चूंकि एक चरम बिंदू पर सेक्स निहायत जरुरी हो जाता है. यह बात महिला-पुरूष दोनों पर लागू होता है. ऐसे बिन्दू पर संकोची लड़कियां अपने पीपासा को शांत करने के लिए अपनी सहेलियों पर निर्भर हो जाती है. ठीक ऐसा ही गे संबंधों में भी होता रहा है.
इस तरह के संबंधों के पीछे अवसाद भी एक कारण है. जब महिला या पुरूष अवसाद ग्रस्त होते हैं और साथ-साथ अकेलेपन की गिरफ्त में आ जाते हैं तब वे शांति की खोज में निकल पड़ते हैं. इसी खोज में जो सबसे ज्यादा नजदीक आ गया चाहे वह सेम सेक्स वाला ही क्यों न हो, उसके साथ संबंध बनने की संभावना बढ जाती है.
सेक्स के जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता है. जब अपोजिट सेक्स का साथ नहीं मिलता है तब ये समान सेक्स में ही अपने कुंठित इच्छा को तुष्ट करने का प्रयास करने लगते हैं. यहीं प्रयास सेम सेक्स संबंधों के रूप में शायद सामने आता है.
दिल्ली हाईकोर्ट का यह कथन कि मानव–मानव के बीच का संबंध चाहे वह समान सेक्स का ही क्यों न हो गैरकानूनी नहीं है. एक तरह से सही ही है. पर क्या इसको प्राकृतिक कानून के खिलाफ नहीं कहा जा सकता! किसी भी काम को करने के पीछे उससे कुछ फल प्राप्ति की चाह होती है. महिला-पुरूष के संबंधों के साथ भी फल प्राप्ति की चाह जुड़ा हुआ पक्ष है.
महिला-पुरूष को समाज ने शादी करने और साथ-साथ रहने के लिए छूट दे रखा है. यह छूट सिर्फ इसलिए नहीं है कि हम आजाद हैं तो कुछ भी कर सकते हैं बल्कि इसलिए है कि हम जिस सामाज में रहते हैं उस समाज को बनाए रखने वाला उत्तराधिकारी चाहिए. कहने का मतलब है कि हम या आप तभी सामाजिक अथवा असामाजिक कहे जा सकेंगे जब यह मानव समाज बचा रहेगा. मानव समाज कि जब हम बात करते हैं तो महिला-पुरूष और दोनों गुणों के मालिक किन्नर सभी आते हैं. बीच वाले अर्थात् हिजड़ों के साथ समस्या यह है कि वे संतान उत्पन्न करने में मेडिकली सक्षम नहीं होते हैं. इसलिए इनकी एक अलग पहचान है. लेकिन जो शौकिया प्राकृतिक नियमों की अवहेलना कर रहे हैं उनका क्या होगा! बेशक ऐसे लोगों को भारत सहित दुनिया के 127 देशों में अप्राकृतिक संभोग की कानूनी मान्यता मिल गई हो पर प्रकृति के कानून से इनको कौन बचायेगा? प्राकृतिक मिलन न हो पाने की स्थिति में क्या वे लोग अपने आप को पुरूष अथवा महिला कह पाने के स्थिति में होंगे! जो महिलाएं मां नहीं बन पाती हैं उनको बांझ कहा जाता है, पर जो बनने के स्थिति में है पर फैशन के फेर में अपने इस कर्तव्य से मुक्त होना चाहती हैं, उनको क्या कहा जाए? विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि विपरित सेक्स वाले अगर स्नेह पूर्वक रहते है तो उनका विकास तेजी से होता है. मानसिक परेशानी दूर रहती है. वैसे भी यह कहा जाता रहा है कि किसी भी सफल पुरूष के पीछे किसी महिला का हाथ और सफल महिला के पीछे किसी पुरूष का हाथ होता है. यह बात भी सच है कि सेक्स ही वह धागा है जो महिला पुरूष को आपस में जोड़े रखता है. ऐसे में अगर यह धागा ही टूट जायेगा तब निश्चित रूप से पारिवारिक ढांचे टूटने शुरू हो जायेंगे.
समाज की पहली इकाई परिवार होता है. जब परिवार का ही अस्तिव खतरे में हो तो समाज को बचा पाना मुश्किल है. वैसे देखा जाए तो परिवार शब्द अपने आप में व्यापक अर्थ रखता है. क्योंकि हम जिस शक्ति की संताने हैं उस आधार पर पूरा मानव एक परिवार ही तो है. भले हम इस परिवार को संकुचित अर्थों में ले तो कह सकते हैं कि मां-बाप और उनके बच्चे बस बन गया परिवार. परिवार के विकास क्रम में मां-बाप का योगदान अहम होता है. पर गेवाद और लेसबियनवाद के बाद मां-बाप का युगल जोड़े का का टूटना शुरू हो जायेगा. जब परिवार की धूरि ही टूट जायेगी तब समाज का क्या होगा? भविष्य की भयावहता को बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है.
वैसे भी व्यक्तिवाद ने संयुक्त परिवार की अवधारणा को लीलना शुरू कर दिया है. या यूं कहा जाए की बहुत हद तक लील चूका है. दादा-दादी की कहानियों से आज के बच्चे अनजान हैं. परी कथाओं को नहीं सुने हैं. लोरी क्या होती है इसको उन्होंने नहीं जाना है. जिन्दगी की सच्चाइयों को मेट्रो शहरों की जिन्दगी ने छुपा लिया है. शहर का प्रभाव गांव की ओर लगातार बढ़ता जा रहा है. सड़कें बन रही हैं. बसे सरपट दौड़ रही है. सब भागम-भाग में है. सब कुछ पाने की जुगत में है. भले ही उनको यह मालूम न हो कि वास्तव में उनको पाना क्या है? ठीक कस्तूरी मृग की तरह. इस भागम -भाग में कब मां-बाप, दादा-दादी, टोला-मोहल्ला, संकरी गलियां, सरसों के फूल, आम के मंजर, कोयल की कूक, नदी की धारा, सब के सब शहर की भेंट चढ़ जाते हैं, मालूम ही नहीं चलता. इसका एहसास तब होता है जब शहर में पत्नी गर्भवती होती है. डॉक्टर कहता है कि इनको आराम की जरूरत है. अपने घर से अपनी मां या किसी बूजुर्ग को बुला लिजीए. इस वक्त किसी कोने में पड़ी मां की याद आती है. मां की याद आते ही गांव का वह सारा दृश्य एक-एक करके घुमने लगता है. हमें लगता हैं कि यहीं एक बिंदू है जहां पर मध्यवर्गीय परिवार को गांव की याद आती है. ऐसे में इस गेवाद के बढ़ने पर यह याद भी जाती रहेगी. क्योंकि तब न तो परिवार बढ़ाने की जरूरत होगी और न ही परिवार नियोजन की!! कहने का मतलब यह है कि पहले से ही टूट चुके पारिवारिक ढांचे को व्यक्तिवाद ने तो तोड़ा ही था. अब जब व्यक्तिवाद ही टूटने के कगार पर पहुंचने लगा है ऐसे में परिवार (विस्तृत अथवा संकुचित अर्थों में) को टूटने से कैसे बचाया जा सकता है?
गेवाद एक सामाजिक रोग है. इसको किसी भी आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता है.

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें