मानवीय स्वभाव को समझना आसान नहीं है. इसे जितनी गहराई से समझने का प्रयास करते हैं, उसी अनुपात में और उलझता चला जाता है, लेकिन कल (30 सितम्बर 2010) एक ऐसी घटना घटी, आंखों के सामने कि इस मानवीय स्वभाव को समझने का एक और अवसर मिल गया. दोपहर के लगभग तीन बजे से लेकर रात्री के 8 बजे तक (अयोध्या मामले की रिपोर्ट देखने के लिए) टीवी सेट पर नजरें चस्पा किए रहने के बाद, मन में सुरत- ए – हाल दिल्ली को देखने की जिज्ञासा हुई. मयूर विहार फेज 2 से बदरपुर (जहां मेरे भैया रहते हैं) जाने के लिए रुट संख्या 534 की बस से महारानी बाग पहुंचा. तकरीबन रात्री के साढे आठ बज रहे होंगे. सड़क पर चहल-पहल वैसी न थी, जैसा अमूमन हुआ करता है. एक विरानी... सुस्ताई सड़क. जिस बस में बैठा था बमुश्किल 10-12 लोग रहे होंगे. रास्ते में दुकानें खुली नजर आ रही थीं, मगर खरीदार नदारद थे. कारण स्पष्ट था, 60 साल पुराने अयोध्या मसले पर फैसले का दिन जो था. हालांकि उस समय तक फैसला आ चुका था. न किसी की हार हुई थी और न ही कोई जीता था. किसी अनहोनी की आशंका ने लोगों को अपने-अपने घरों में कैद होने के लिए मजबूर कर दिया था. दिल्ली की सड़कों पर जो लोग नजर आ रहे थे उनके मन में भय का कहीं कोई भाव नहीं था. भारतीय नागरिकों की परिपक्वता झलक रही थी. ठीक वैसे ही जैसा कि एनडीटीवी पर पंकज पचौरी, रवीश कुमार और कमाल खान के रिपोर्टों में झलक रही थी. खैर, मुझे आश्रम मोड़ से बदरपुर के लिए बस पकड़नी थी, सो मैं 534 न. की बस से महारानी बाग ही उतर गया. वहां से आश्रम मोड़ महज 200 मीटर की दूरी पर है. मैं पैदल ही जा रहा था. अचानक एक बाइक दुर्घटना ग्रस्त हो गई. उसकी जद में एक साइकिल सवार भी आ गया है. बाइक पर दो युवक थे, एक के सिर में चोट लगती है, वह अचेतावस्था में चला गया. दूसरे को कम चोट लगी, वह उठा है और सीधे गाली देते हुए साइकिल सवार की ओर लपका. तब तक मैं और कुछ और राहगिर वहां पहुंच चुके थे. बाइक सवार को डांटकर उसे अपने दूसरे साथी को अस्पताल ले जाने की सलाह दी. इसी बीच मैं स्टैंड में खड़े दिल्ली पुलिस के एक सिपाही को बुला लाया. वह आकर पीसीआर को फोन करता है. लेकिन इस दरम्यान अचेतावस्था में पड़े दूसरे बाइक सवार को होश आ जाती है. वे दोनों जाने की जिद करने लगते हैं. पुलिस वाला उनके जिद के कारण उनको जाने देता है. महज 12-13 मिनट बाद पीसीआर वैन आती है, लेकिन उसे बैरन ही लौटना पड़ता है. मैं साइकिल वाले से पूछता हूं, भैया आप ठीक हो न... वह जवाब देता है- हां, और बिना देर किए एक सवाल दागता है-"आपलोग उन दोनों के जाने क्यों दिए, उनसे कुछ पैसा लेता!!” यह सुनकर मैं भौचक रह गया. उपरोक्त दोनों घटनाओं ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज आदमी को रुपए ने कितना मजबूर कर दिया है. जरा सोचिए जिस हाल में साइकिल सवार (अभी कुछ ही क्षण पहले वह मौत के चंगुल से निकला था) था, उस हाल में अगर उसे अपने सही सलामत बच जाने की जितनी खुशी नहीं है, उससे कहीं ज्यादा निराशा उन दोनों को छोड़े जाने से है. वह मौत के चंगुल में भी कुछ रुपयों की चाह रखता है. जरा सोचिए वह किस तंगहाली से गुजर रहा होगा? यह किसी इंसान के तंगहाली की पराकाष्ठा ही है, जहां वह अपने मौत के सदमे में भी रुपयों की चाह रखता है. दूसरी तरफ जरा गौर कीजिए पहली घटना पर जब एक दोस्त अपने चोट खाए दोस्त की चिंता छोड़कर एक साइकिल वाले को मारने के लिए दौड़ता है (जिसमें उसकी दबंगई की झलक मिलती है ). उस युवक (उम्र 20-22) के व्यवहार को हम अपने मध्यवर्गीय समाज के व्यवहार के प्रतिकात्मक रूप से देख सकते हैं. जो अपने गलतियों को मानने के लिए तैयार नहीं है. निम्न मध्यम वर्ग से मध्यम वर्ग की श्रेणी में पहुंचे ऐसे लोग समाज में अपनी कुंठओं को प्रदर्शित करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ना चाहते. शायद यहीं कुंठा उस युवक को एक असहाय साइकिल सवार पर हाथ उठाने के लिए प्रेरित कर रही थी.
मानवीय व्यवहार के इस रंग को देखकर मैं खुद सदमे में हूं, जहां पर आदमी के लिए रुपया साध्य हो गया है. शायद इसी तरह के किसी अनुभव के बाद वेस्ट के राजनीतिक विचारक मैकियावेली को मानव स्वभाव के बारे में यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा होगा कि, 'मानव अपने पिता के मौत के जिम्मेदार आदमी को तो माफ कर सकता है, लेकिन आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाले को वह हरगिज माफ नहीं कर सकता.'
खैर, अयोध्या पर फैसला आने के बाद की दिल्ली को देखने निकला था, सो देख लिया, जी भर के...
और यह तो कह ही सकता हूं कि मंदिर-मस्जिद के मसले पर दिल्ली वालों के दिल पर अब राज़ तो नहीं ही किया जा सकता.
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