शुक्रवार, 12 नवम्बर 2010

छठ: आस्था पर राजनीति

बिहार के सबसे बड़े सांस्कृतिक पर्व छठ का विस्तार बहुत तेजी से सभी नगरो-महानगरों में हो रहा है. मुंबई, दिल्ली और कोलकाता के साथ-साथ छठ मनाने वालों की अच्छी-खासी तादाद दक्षिण के राज्यों में भी देखने को मिल रही है. इतना ही नहीं पूर्वोत्तर के राज्य भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं.

देश के बड़े शहरों में जैसे-जैसे छठ मनाने वालों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस संख्या पर राजनीति करने वालों की संख्या में भी इजाफा होता जा रहा है.

राम नरेश मिश्रा का परिवार दिल्ली के जैतपुर गांव में पिछले 20 सालों से रहता आ रहा है. उनका कहना है कि वे लोग जब यहां आए तब छठ करने वालों की संख्या बहुत कम थी. लेकिन अब छठ व्रतियों की संख्या हजारों में हो गई है. बदरपुर के ही रहने वाले डॉ. रजा हैदर का कहना है कि छठ का प्रभाव देखना हो तो आप यहां के दीवारों पर छठ की शुभकामनाओं से अटे पड़े पोस्टरों पर गौर फरमाइए. दिल्ली की सभी पार्टियों के स्थानीय नेता अपने मतदाताओं को लुभाने के लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स और बैनरों पर शुभकामना संदेश देने में जुट गए हैं. शायद यही कारण है कि आली गांव में बैनर बनाने का काम करने वाले असलम खां को इन दिनों बैनर पर शुभकामना संदेश लिखने से फुर्सत नहीं है. असलम खां का कहना है कि, अक्टूबर-नवंबर महीने में उनकी कमाई कई गुना बढ़ जाती है क्योंकि इन महीनों में दशहरा, दीपावली और छठ का पर्व मनाया जाता है और छोटे-बड़े सभी नेता इन मौकों पर अपने क्षेत्रवासियों को बधाई देने से चूकना नहीं चाहते.
इन शुभकामना संदेशों के निहितार्थ को समझाते हुए पुरबिया नेता प्रभुनाथ सिंह ने बताया कि शहरों में जैसे-जैसे पूर्वांचल के लोगों कि संख्या बढ़ रही है और वोट प्रतिशत बढ रहा है, वैसे-वैसे नेताओं का नजरिया भी बदला है.

अगर दिल्ली के राजनीतिक भूगोल की बात की जाए तो दिल्ली की सात लोकसभा सीटों में से पूर्वांचली मतदाता चार सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं. कांग्रेस ने पहले छठ पर छुट्टी घोषित कर व भोजपुरी-मैथिली-अकादमी की स्थापना कर और अब महाबल मिश्र को लोकसभा में भेजकर पूर्वांचलवासियों को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश की है. चुनाव आते ही राजनीतिक दल दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचल यानी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मतदाताओं को लुभाने में लग जाते हैं. पिछले कुछ सालों में जिस तरह से दिल्ली की तस्वीर बदली है, उसमें पूर्वांचल के लोग वोट बैंक के रूप में एक मजबूत ताकत बन कर उभरे हैं.
दिल्ली में मतदाताओं की संख्या करीब1.10 करोड़ है. इसमें से करीब 35 लाख मतदाता पूर्वाचल के हैं. विशाल वोट बैंक की वजह से ही पूर्वांचली दिल्ली की राजनीतिक तस्वीर बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं. वैसे तो पूर्वांचली लोगों की उपस्थिति दिल्ली के कोने-कोने में है, लेकिन सात में से चार लोकसभा और दो दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक भूमिका में होते हैं. दिल्ली की पूर्वी उत्तर पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में पूर्वांचली मतदाताओं की संख्या 20 से 25 फीसदी के करीब है. जबकि बाकी तीनों सीटों पर पूर्वांचली मतदाताओं की तादाद करीब 10 फीसदी है.
पूर्वांचल के लोगों कि बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि पुरबियों के सांस्कृतिक पर्व छठ में शरीक होने के लिए नेताओं की होड़ लगी रहती है. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के सीएम इन वेटिंग विजय कुमार मल्होत्रा ने पूर्वांचलियों को रिझाने के लिए सूर्य को अर्घ्य दिया था. दूसरी ओर दिल्ली की मुख्यमंत्री और अपने को पूर्वांचल की बेटी कहने वाली शीला दीक्षित छठ घाटों का निरीक्षण करती नजर आ जाती हैं. पूर्वांचली मतदाताओं को लुभाने की इसी कवायद का नतीजा है कि बिहार जागरण मंच की ओर से पूर्वी दिल्ली में यमुना के तट पर पल्टन पुल भैरो मार्ग पर कराए जाने वाले छठ पूजा के आयोजन में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, एके वालिया, मदन लाल खुराना, महाबल मिश्रा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता-अभिनेता पहुंचते रहे हैं. बिहार जागरण मंच के अध्यक्ष दिनेश प्रताप सिंह भी इस बात से इंकार नहीं कर रहे हैं कि छठ के माध्यम से राजनीतिक लाभ उठाने का भरसक प्रयास होता रहा है.
इस बार छठ पूजा के दौरान भाजपा दिल्ली में रहने वाले पूर्वांचली लोगों को खुश करने के लिए एक नई कोशिश करने वाली है. दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में बने छठ पूजा के घाटों पर भाजपा के कार्यकर्ता अपना बैनर लिए लोगों की मदद करते और चाय पिलाते नजर आयेंगे. प्रदेश अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता की अध्यक्षता में हुई एक मीटिंग में दिल्ली प्रदेश भाजपा ने यह तय किया है कि इस बार पार्टी सभी छठ घाटों पर अपने बैनर तले छठ व्रतियों की सुविधा के लिए टेंट और कैंप लगायेगी. इस बाबत दिल्ली प्रदेश भाजपा के सचिव कुलजीत सिंह चहल ने बताया कि भाजपा इस बार छठ व्रतियों को किसी तरह की असुविधा न हो इसका पूरा-पूरा ख्याल रखेगी. उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस की सरकार पुरबियों को फुसलाने के लिए घोषणाएं तो कर देती है लेकिन उन घोषणाओं पर अमल नहीं किया जाता. न तो छठ घाटों की सफाई का ख्याल रखा जाता है और ना ही छठ पूजा करने के लिए नदी-तालाब में साफ पानी की कोई व्यवस्था की जाती है.
पिछले 50 सालों से दिल्ली में रह रहे और दिल्ली में छठ के क्रमवार विकास को देखने वाले भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दुबे ने अपनी यादों को ताजा करते हुए कहते हैं, “1956 में मेरा परिवार सरोजनी नगर में रहता था. उस समय मेरे घर की औरतें घर की छत पर खड़े होकर उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया करती थीं. 60-70 के दशक में मुहल्ले में एक गढ्ढा खोदकर और उसमें पानी भर कर छठ पूजा होने लगी. 70-80 के दशक में मेरा परिवार पालम के क्षेत्र में आ गया. वहां डाबरी मंदिर के पास एक तालाब के किनारे छठ किया जाने लगा. देखते-देखते हजारों की संख्या में महिलाएं छठ व्रत करने लगी हैं.''
पुरबियों की तादाद दिल्ली में लगातार बढ़ी है और उसके साथ राजनीतिक भागीदारी में भी इजाफा हुआ है. यही कारण है कि दिल्ली के सभी दल इस वोट बैंक को अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं. लेकिन राजनीतिक दल इस बात को स्वीकारने में हिचकते हैं. दिल्ली में कांग्रेस का पुरबिया चेहरा समझे जाने वाले शिवराम पांडेय को छठ के नाम पर कोई राजनीति की बात नागवार गुजरती है. उनका कहना है कि छठ पूर्वांचल के लोगों का एक सांस्कृतिक पर्व है और इसमें सभी लोग भाग लेते हैं. उन्हीं के सुर में सुर मिलाते हुए और छठ के नाम पर किसी तरह की राजनीति से इनकार करते हुए दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष जय प्रकाश अग्रवाल ने टीएसआई को बताया कि हमारे क्षेत्र में छठ मनाने वाले लोगों की भारी तादाद है. जिस तरह से मैं रामलीला में भाग लेने जाता हूं उसी तरह छठ में भी भाग लेता हूं. इसमें राजनीति की कहां बात है. एक सामाजिक आदमी होने के नाते छठ जैसे बड़े आयोजन में भाग लेने को राजनीतिक फायदे-नुकसान की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए.

ऐसा नहीं है कि छठ पर राजनीति केवल दिल्ली में ही देखने को मिलती है. छठ पर सबसे ज्यादा कहीं राजनीति होती है तो वह है देश की आर्थिक नगरी मुंबई. दिल्ली की ही तरह मुबंई में भी छठ को लेकर बहुत जोर-शोर से तैयारी होती है. संजय निरूपम जब शिवसेना में हुआ करते थे, तब से ही वे वहां पर बिहार के लोगों को एक सूत्र में बांधने का काम करते रहे हैं. जुहू घाट पर छठ पूजा को भव्यता प्रदान करने में भी संजय निरूपम का अहम योगदान रहा है. संजय निरूपम अगर आज लोकसभा पहुंचे हैं तो उसके पीछे वहां रह रहे पुरबिया लोगों की ताकत का बड़ा योगदान है.

मुंबई में पुरबियों की बढ़ती ताकत का अंदाजा उससे भी हुआ जब पुरबिया लोगों को मुंबई से भगाने की मुहिम चला रहे राज ठाकरे यह कहना पड़ा कि वह छठ पूजा के खिलाफ नहीं है बल्कि छठ के नाम पर जो राजनीति हो रही है उसके खिलाफ हैं. बेशक छठ को लेकर मुंबई में सबसे ज्यादा राजनीति होती हो लेकिन अगर हम कोलकाता की बात करें तो वहां का माहौल बिल्कुल ही अलग है. पिछले चार दशक से वाम सरकार होने के कारण यहां पर छठ पूजा राजनीति से बची हुई है. कोलकाता से निकलने वाले हिंदी दैनिक सन्मार्ग के संपादकीय प्रभारी हरिराम पांडेय बताते हैं, " कोलकाता में छठ बड़े पैमाने पर मनाई जाती है. छठ के दिन उत्सवी माहौल हो जाता है लेकिन अभी तक इस पर्व पर राजनीति की कोई बात सामने नहीं आई है. हालांकि सरकारी स्तर पर छठ व्रतियों की सुविधा के लिए हर संभव प्रयास किए जाते हैं. गांधी घाट, बाबू घाट, फेरी घाट और दक्षिणेश्वर घाट पर छठ व्रतियों जन सैलाब देखने लायक होता है.

बेशक कोलकाता में छठ को लेकर राजनीति न होती हो लेकिन उससे सटे पूर्वोत्तर के राज्यों में छठ पर राजनीति होने लगी है. पूर्वोंत्तर मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रवि शंकर रवि का कहना है कि पिछले 10 सालों में छठ को लेकर राजनीति की झलक मिलने लगी है. सबसे पहले असम गण परिषद की सरकार ने प्रफुल्ल महंथ के मुख्यमंत्रित्व काल में छठ के दिन एच्छिक छुट्टी की घोषणा की थी. इसके बाद हिंदीभाषियों का झुकाव महंथ सरकार की ओर बढ़ा था. इसको देखते हुए कांग्रेस के नेता भी छठ के दिन घाट पर देखे जाने लगे. अगर असम की भौगोलिक स्थिति को देखा जाए तो बराक घाटी, ब्रह्मपुत्र घाटी और पहाड़ी इलाकों में यहां की ज्यादातर आबादी रहती है. जिसमें बराक घाटी में बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगों की संख्या है. इन्हीं लोगों के बल पर 10 हिंदी भाषी विधायक चुनकर विधानसभा में पहुंचते हैं. अगर पूरे पूर्वोंत्तर की बात की जाए तो तकरीबन 20 लाख हिंदी भाषी है. लेकिन असम को छोड़कर बाकी राज्यों में वे इतने मजबूत नहीं हैं. शायद यही कारण है कि वहां पर छठ के नाम पर राजनीति की झलक नहीं के बराबर दिखती है.

इसी तरह दक्षिण के राज्यों में भी धीरे-धीरे छठ करने वालों की संख्या बढ़ रही है. लेकिन वहां छठ को लेकर फिलहाल कोई राजनीतिक गहमागहमी नजर नहीं आती है. बंगलोर में रह रहे रामध्यान प्रसाद का कहना है कि, यहां पर हिंदी प्रदेश के लोगों की संख्या कम होने के कारण छठ पर्व व्यापक रूप से नहीं मनाया जाता है. खुद उनका परिवार पिछले पांच सालों से मुहल्ले में छठ पूजा करता रहा है. लेकिन अब धीरे-धीरे छठ करने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है.
जिस तरह से छठ जैसे सांस्कृतिक पर्व को राजनीतिक रंग में रंगा जा रहा है और इसको लेकर राजनीतिक बिसात पर लाभ-हानि का गणित बिठाया जा रहा है, उसको देखते हुए यह नहीं लगता कि छठ पर होने वाली राजनीति आने वाले दिनों में कम होगी.


छठ पर्व की शुभकामना के साथ आपका
आशुतोष कुमार सिंह


नोट-इस आलेख का संपादित रूप द संडे इंडियन (हिंदी-भोजपुरी) में प्रकाशित हो चुका है.

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें