शनिवार, 13 अगस्त 2011

21वीं सदी का गांधी


आशुतोष कुमार सिंह

मोहनदास करमचंद गांधी जब दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और अहिंसक मार्ग से भारत को आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह मार्ग इतना कारगर होगा। लेकिन धीरे-धीरे गांधी आगे बढ़ते गए और उनका कारवां बढ़ता गया। लोग जुड़ते गए। आखिरकार फिरंगी देश को छोड़ कर जाने के लिए मजबूर हुए। भारत आजाद हुआ। दुर्भाग्य देश का, गांधी के विचारों का और खुद गांधी का कि भारतीय आजाद नहीं हो पाए!
भारतीय भूखंड को दो देशों में विभक्त कर दिया गया। भारत की कोख से पाकिस्तान रूपी एक नए देश को जबरदस्ती कहें या मजबूरन जन्म हुआ।
खैर यहां पर मेरी मंशा भारत-पाक के संबंध में चर्चा करने की नहीं है। मैं आजादी के बाद के भारत की बात कर रहा हूं। गुलाम भारतीयों की बात करना चाहता हूं। आजादी के बाद जिन लोगों के हाथ में जनता ने अपनी सेवा कराने का कार्यभार सौंपा, वे लोग अपने बाद वाली पीढ़ी को यह बताने में नाकाम रहें कि उन्हें जनता ने अपनी सेवा करने के लिए अपना प्रतिनिधि बनाकर संसद अथवा विधानसभाओं में भेजा है। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी की यह संवादहीनता धीरे-धीरे इतनी प्रबल हो गई कि आज जिन पर जनता की सेवा करने का कार्यभार है, वे ‘जनसेवक’ की जगह ‘खुद के सेवक’ हो गए हैं।
परिणाम स्वरूप जनतंत्र का ‘तंत्र’ जन को अपनी पैरों की धूल समझने लगा। सबसे चिंतनीय स्थिति तो उस समय से उत्पन्न होने लगी, जब इस ‘तंत्र’ के ‘कलपुर्जे’ अपनी सेवा के बदले में ‘कुछ’ की मांग करने लगे। जन को लगा कि अगर कुछ देने भर से उनका काम हो जाता है तो इसमें बुराई क्या है? शुरू में जन की ओर से की गई यह गलती धीरे-धीरे इतनी विकराल हो गई कि ये कलपुर्जे बिना ‘कुछ’ लिए काम करना ही बंद कर दिए।
ऐसे में जन में ‘तंत्र’ के इन ‘कलपुर्जों’ के प्रति दुराव की भावना का पनपना स्वाभाविक ही (था) है। पहले तो जन को लगा कि कोई बात नहीं धीरे-धीरे सबकुछ ठीक हो जायेगा। लेकिन जब सबकुछ में कुछ भी ठीक होने की कोई संभावना नहीं दिखी तो 21 वीं सदी के गांधी का जन्म हुआ। जिसको लोग 21 वीं सदी के दूसरे दशक में अन्ना हजारे के नाम से जान-पहचान रहे हैं। वैसे तो इस नाम से देश-दुनिया के लोग परिचित थे लेकिन जब इस नाम ने गांधी का रूप धारण किया तो सारी दुनिया देखती रह गई। गुलाम भारतीयों को लगा कि अब उनको भी आजादी मिलने वाली है। पूरे देश में अन्ना रूपी गांधी की आंधी उसी तरह बहने लगी जैसे 20 वीं सदी के दूसरे, तीसरे और चौथे दशक में महात्मा रूपी गांधी की बही थी। जिन्होंने फिरंगियों को सात-समंदर पार जा ढ़केला।
इसी तरह की आंधी की बयार दिल्ली के जंतर-मंतर के प्रांगण से बही और देखते ही देखते पूरा हिंदुस्तान इसके आगोश में आ गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ चली इस बयार ने ‘तंत्र’ को यह बता दिया कि तुम ‘जन’ के सेवक हो, जन के मालिक नहीं। 21वीं सदी का चालाक हो चुके ‘तंत्र’ ने भी चालाकी से इस बयार को तुरंत शांत करने के लिए, अन्ना की शर्तों को मान लिया।
भ्रष्टाचार के खिलाफ बही इस आंधी में जनतंत्र को मजबूत करने वाला चौथा स्तंभ अर्थात् मीडिया ने सराहनीय कार्य किया। लेकिन यह एक अहम सवाल है कि मीडिया ने क्या सचमुच प्रशंसनीय कार्य किया अथवा उससे हो गया!
यह जगजाहिर है कि पिछले दो दशकों में मीडिया ने अपना एक अलग तंत्र विकसित किया है, जो जनतंत्र के ‘तंत्र’ के साथ सांठ-गांठ कर के जन में भ्रम पैदा करने का काम करता रहा है। खैर जाने-अंजाने में ही सही, मीडिया ने गांधी को उभारने का काम तो किया ही। इसके लिए उसकी सराहना तो की ही जानी चाहिए।


पिछले दो सालों से महात्मा गांधी द्वारा लिखित पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ के सौ साल पूरे होने के परिप्रेक्ष्य मंर पूरे हिंदुस्तान में कई जगहों पर गांधी की प्रासंगिकता पर नए सिरे से बहस चलती रही है। इन्हीं बहसों के परिणाम के रूप में 21 वीं सदी के गांधी के जन्म को भी लिया जाना चाहिए। जिसने गांधी की प्रासंगिकता को नए सिरे से परिभाषित करने का काम किया है और ‘तंत्र’ के ‘कलपुर्जों’ को यह बताने में सफल रहा है कि सुधर जाओ नहीं तो ‘ईंधन’ बंद कर देंगे।
बचपन से स्व. पं. श्री राम आचार्य की यह उक्ति सुनता रहा हूं-21वीं सदी उज्ज्वल भविष्य। तो क्या सचमुच इस सदी में हम 20 वीं सदी के स्याह पक्षों को उज्ज्वल कर पाएंगे! अगर यह संभव हो गया तो शायद जगदगुरु भारत को एक बार फिर से सोने की चिड़िया कहलाने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।
लेखक संस्कार पत्रिका में सीनियर कॉपी एडिटर हैं
संपर्क
zashusingh@gmail.com

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें