शनिवार, 21 जनवरी 2012

बस जीने दो यारों...



वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है।


आशुतोष कुमार सिंह

सम्बन्ध। इस बन्धन से आज दुनिया मुक्त होना चाहती है। मुक्ति की कामना रखने वाले इससे अकुता गए हैं। फिजूल का झंझट भला क्यों मोले बिंदासपन में जीने वाले ये लोग। देश आजाद है, हम भी आजाद हैं। आजादी हैं सम्बन्धविहिन समझौतावादी समाज में जीने का। जहाँ पर आप और हम वस्तु की तरह खरीदे-बेचे जाते हैं। तौले जाते हैं। मापे जाते हैं। रौंदे जाते हैं। पटके जाते हैं। मन भर गया तो उठा कर फेंक दिए जाते हैं। समझौता रद्द कर दी जाती है। कोई बोलने वाला नहीं। टोकने वाला नहीं। मनाने वाला नहीं। हम आजाद देश के आजाद लोग जो ठहरे!

हम चाहते हैं-सम्बन्ध हो बन्धन न हो। बन्धन हमारी समझौतावादी समाज को पनपने देने में सबसे बड़ी रोड़ा जो है। रास्ता सुगम बनाना है तो रोड़ों को तो हटाना ही पड़ता है। हम भी लगे हैं, इन रोड़ों को हटाने में...हो सके तो मिटाने में। न बाँस रहेगा न बाँसुरी बजेगी। और हम मस्त होकर ताँडव करते रहेंगे।

वैसे तो ताँडव हमारा पुराना शौक है। पर इसे करने से हम डरते थे, सहमते थे, लजाते थे, संकुचाते थे। अब कैसा डर, किसका डर, क्यों डरे हम...कोई है... जो रोके हमें, टोके हमें...जो थे, या हो सकते थे उनको तो हमने कब का टपका दिया है। अब तो उनके लोर (आँसू) भी उनका साथ नहीं देते...वे चाहते हैं अपने लोर से समुद्र में हिलोर लाना। अफसोस! समुद्र की गहराई ने पहले ही उनकी लोर को इतना सोंख लिया है कि आँखों की नमी सूर्ख हो गयी हैं। अब तो बंद होने को आई पुतलियाँ तमाशबिन बन कर रह गई हैं।

सम्बन्धविहिन समाज के निर्माण का वायरस धीरे-धीरे मानवीय धरा को अपने जद में लेने में सफल हो रहा है। और हम उसकी सफलता पर ताली बजा रहे हैं। जश्न मना रहे हैं। आजादी के गीत गा रहे हैं।
दुनिया में कुछ दूसरे लोग भी हैं। जिन्हें इनकी आजादी पसन्द नहीं है। वे इनसे जलते हैं, खुद को जलाते हैं और इसी में भस्म हो जाते हैं। इनको वे वायरस कहते हैं।

अब उन्हें यह अनुभव हो गया है कि उन्हें जरूरत है मजबूत एंटीवारयस की। जिसमें सम्बन्धों को जीने की ललक हो। सम्बन्धों की समझ हो। एक-दूसरे से बंधे रहने की चाहत हो। बंधन का अनुशासन हो। उनके लिए सम्बन्धों की परिभाषा ही दूसरी है। वे सम्बन्धों से मुक्त नहीं बल्कि सम्बन्धों से युक्त रहना चाहते हैं।

सच में एक-दूसरे से समान रूप से बंधने को ही तो सम्बन्ध कहते हैं। बंधन में असमानता ही सम्बन्धों को असहज बनाती है। असुरक्षित करती है और सम्बन्धविहिन वायरस को फैलने का प्लैटफॉर्म देती है। सम्बन्ध कभी भी विषम नहीं होता। वह सम् ही होता है। सम् का मतलब समानता से भी है और समर्पण से भी। दोनों के बीच संबन्धों का तापमान जबतक बराबर रहता है, समर्पण के भाव में गहराई रहती है...सम्बन्ध बने रहते हैं। जब तापमान में उतार-चढ़ाव आता है और कुछ ज्यादा ही आ जाता है, तब सम्बन्ध समान नहीं रह जाते। सम्बन्ध में से सम् अर्थात् समानता और समर्पण गायब हो जाते हैं। इस सम् के बिना सम्बन्ध की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? इसके बिना सम्बन्ध तो ‘बन्ध’ बनकर ही रह जाता है। और इसी ‘बन्ध’ में केमिकल लोचा होकर संबन्धविहिन समाज का वायरस तैयार होता है।

हम तो दर्शी हैं। वायरस को फैलते भी देखते हैं और एंटीवायरस को इससे जुझते भी। जीत किसकी होगी यह तो कोई दूरदर्शी ही बतायेगा। मैं तो बस सम्बन्धों को जीने में विश्वास करता हूँ, जीता भी हूँ और अपने वायरसों एवं एंटीवारसों से यही चाहता हूँ-बस जीने दो यारों...

संपर्क-91-8108110151

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